Ranchi : झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार की खनन नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि खनिज संपदा से समृद्ध होने के बावजूद झारखंड नीतिगत विफलता, प्रशासनिक सुस्ती और पारदर्शिता की कमी के कारण विकास और राजस्व के मामले में पिछड़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य के युवाओं को रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के बजाय सरकार की लापरवाही से खनन गतिविधियां प्रभावित हुई हैं।
भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में बाबूलाल मरांडी ने बताया कि हाल ही में चाईबासा के सारंडा क्षेत्र के दौरे के दौरान कई खदानें वर्षों से बंद मिलीं। उन्होंने कहा कि कई खनन पट्टों की अवधि समाप्त होने के बावजूद उनका नवीनीकरण या दोबारा नीलामी नहीं की गई, जिससे स्थानीय लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ है और बड़ी संख्या में युवाओं का पलायन बढ़ा है। उनके अनुसार, इसका असर परिवहन, होटल, दुकानों और छोटे कारोबारों पर भी पड़ा है।
उन्होंने कहा कि पड़ोसी राज्य ओडिशा का उदाहरण झारखंड के सामने है। जामदा से कुछ ही दूरी पर स्थित बड़बिल क्षेत्र में समय पर खनिज ब्लॉकों की नीलामी और उत्पादन बढ़ने से रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। इसके विपरीत, झारखंड में वर्ष 2019-20 से अब तक देशभर में हुई 434 खनिज ब्लॉकों की नीलामी में केवल तीन ब्लॉक ही नीलाम किए गए, जबकि ओडिशा में 45 और छत्तीसगढ़ में 41 ब्लॉकों की नीलामी हुई। उन्होंने इसे प्रशासनिक विफलता करार दिया।
बाबूलाल मरांडी ने दावा किया कि खनिज ब्लॉकों की नीलामी में देरी का सीधा असर उत्पादन और राजस्व पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच ओडिशा का लौह अयस्क उत्पादन 120 मिलियन टन से बढ़कर 180 मिलियन टन हो गया, जबकि झारखंड का उत्पादन लगभग 23 मिलियन टन पर ही स्थिर रहा। उन्होंने यह भी कहा कि देश के लगभग 40 प्रतिशत खनिज संसाधन होने के बावजूद वर्ष 2025-26 में झारखंड का खनन राजस्व करीब 22 हजार करोड़ रुपये रहा, जबकि ओडिशा ने कम संसाधनों के बावजूद 46 हजार करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया।
नेता प्रतिपक्ष ने पश्चिमी सिंहभूम जिले में पत्थर खदानों और उद्योगों की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नोआमुंडी क्षेत्र की अधिकांश खदानें बंद पड़ी हैं और झींकपानी स्थित एसीसी प्लांट के बंद होने से लगभग 1600 परिवारों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) फंड के उपयोग में भी पारदर्शिता का अभाव है। उनके अनुसार, पश्चिमी सिंहभूम में वर्ष 2016 से 2026 के बीच करीब 3700 करोड़ रुपये जमा हुए, लेकिन इसके उपयोग का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया।
बाबूलाल मरांडी ने सरकार पर निवेश और विकास के दावों को खोखला बताते हुए कहा कि जब स्वीकृत खदानें बंद हैं, उत्पादन नहीं बढ़ रहा है और उद्योग संकट में हैं, तब सरकार के दावे वास्तविकता से मेल नहीं खाते। उन्होंने कहा कि खनन क्षेत्र की बदहाली से राज्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि बंद पड़ी खदानों और पत्थर खदानों की नीलामी जल्द पूरी की जाए, खनन गतिविधियों को दोबारा शुरू करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए, रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया जाए और DMFT फंड के संग्रह एवं खर्च का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा पर सबसे पहला अधिकार राज्य की जनता का है और सरकार को जवाब देना चाहिए कि संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद लोग विकास और रोजगार से क्यों वंचित हैं।



