Ranchi: बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद झारखंड की सियासत भी गरमा गई है। इस घटनाक्रम पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने का आरोप लगाया है।
झारखंड सरकार के मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने कहा कि भाजपा की राजनीतिक रणनीति ही अपने सहयोगी और क्षेत्रीय दलों को “निगलने” की रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार की जगह भाजपा का मुख्यमंत्री बनाए जाने से जदयू के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने आगे कहा कि भाजपा ने पहले भी कई राज्यों में अपने सहयोगी दलों को धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंचाया है और बिहार में भी यही प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उनके अनुसार, यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में जदयू बिहार की राजनीति में किस हद तक अपना अस्तित्व बनाए रख पाता है। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड में एनडीए के अन्य सहयोगी दलों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है।
इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के बयान का हवाला दिया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा को अक्सर “बाहर से आए नेताओं” पर ही भरोसा करना पड़ता है। योगेंद्र प्रसाद ने भी इसी संदर्भ में कहा कि सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से शुरू हुआ था, जो भाजपा के भीतर नेतृत्व की कमी को दर्शाता है।
वहीं, कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता निरंजन पासवान ने भी भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी लंबे समय से बिहार में सत्ता हासिल करने की कोशिश कर रही थी और अब उसने नीतीश कुमार को हटाकर अपना मुख्यमंत्री बना लिया है। उन्होंने आशंका जताई कि नीतीश कुमार के बिना जदयू का संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ सकता है।
निरंजन पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार ने वर्षों की मेहनत से जदयू को मजबूत बनाया था, लेकिन उनके मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद पार्टी के अस्तित्व पर संकट गहरा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाला समय बिहार की राजनीति के लिए निर्णायक साबित होगा।
समग्र रूप से देखा जाए तो सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से न केवल बिहार बल्कि पड़ोसी राज्य झारखंड की राजनीति पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना है। इस घटनाक्रम ने क्षेत्रीय दलों और भाजपा के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को और तीखा कर दिया है, जिससे आगामी चुनावों में नए समीकरण उभर सकते हैं।


